(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

Aadiparv (Mahabharat) - आदिपर्व (महाभारत)


॥ श्रीः ॥
1.21. अध्यायः 021
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Topics
उच्चैःश्रवसो दर्शार्थं कद्रूविनतयोर्गमनम्॥ 1 ॥
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Text

सौतिरुवाच। 1-21-0x(87)(1288)
ततो रजन्यां व्युष्टायां प्रभातेऽभ्युदिते रवौ।
कद्रूश्च विनता चैव भगिन्यौ ते तपोधन॥ 1-21-1(1289)
अमर्षिते सुसंरब्धे दास्ये कृतपणे तदा।
`स्मगरस्य परं पारं वेलावनविभूषितम्।'
जग्मतुस्तुरगं द्रष्टुमुच्चैःश्रवसमन्तिकात्॥ 1-21-2(1290)
ददृशातेऽथ ते तत्र समुद्रं निधिमम्भसाम्।
महान्तमुदकागाधं क्षोभ्यमाणं महास्वनम्॥ 1-21-3(1291)
तिमिंगिलझषाकीर्णं मकरैरावृतं तथा।
सत्वैश्च बहुसाहस्रैर्नानारूपैः समावृतम्॥ 1-21-4(1292)
भीषणैर्विकृतैरन्यैर्घोरैर्जलचरैस्तथा।
उग्रैर्नित्यमनाधृष्यं कूर्मग्राहसमाकुलम्॥ 1-21-5(1293)
आकरं सर्वरत्नानामालयं वरुणस्य च।
नागानामालयं रम्यमुत्तमं सरितां पतिम्॥ 1-21-6(1294)
पातालज्वलनावासमसुराणां च बान्धवम्।
भयंकरं च सत्त्वानां पयसां निधिमर्णवम्॥ 1-21-7(1295)
शुभं दिव्यममर्त्यानाममृतस्याकरं परम्।
अप्रमेयमचिन्त्यं च सुपुण्यजलमद्भुतम्॥ 1-21-8(1296)
घोरं जलचरारावरौद्रं भैरवनिःस्वनम्।
गम्भीरावर्तकलिलं सर्वभूतभयंकरम्॥ 1-21-9(1297)
वेलादोलानिलचलं क्षोभोद्वेगसमुच्छ्रितम्।
वीचीहस्तैः प्रचलितैर्नृत्यन्तमिव सर्वतः॥ 1-21-10(1298)
चन्द्रवृद्धिक्षयवशादुद्वृत्तोर्मिसमाकुलम्।
पाञ्चजन्यस्य जननं रत्नाकरमनुत्तमम्॥ 1-21-11(1299)
गां विन्दता भगवता गोविन्देनामितौजसा।
वराहरूपिणा चान्तर्विक्षोभितजलाविलम्॥ 1-21-12(1300)
ब्रह्मर्षिणा व्रतवता वर्षाणां शतमत्रिणा।
अनासादितगाधं च पातालतलमव्ययम्॥ 1-21-13(1301)
अध्यात्मयोगनिद्रां च पद्मनाभस्य सेवतः।
युगादिकालशयनं विष्णोरमिततेजसः॥ 1-21-14(1302)
वज्रपातनसंत्रस्तमैनाकस्याभयप्रदम्।
डिम्बाहवार्दितानां च असुराणां परायणम्॥ 1-21-15(1303)
बडवामुखदीप्ताग्नेस्तोयहव्यप्रदं शिवम्।
अगाधपारं विस्तीर्णमप्रमेयं सरित्पतिम्॥ 1-21-16(1304)
महानदीभिर्बह्वीभिः स्पर्धयेव सहस्रशः।
अभिसार्यमाणमनिशं ददृशाते महार्णवम्।
आपूर्यमाणमत्यर्थं नृत्यमानमिवोर्मिभिः॥ 1-21-17(1305)
गम्भीरं तिमिमकरोग्रसंकुलं तं
गर्जन्तं जलचररावरौद्रनादैः।
विस्तीर्णं ददृशतुरम्बरप्रकाशं
तेऽगाधं निधिमुरुमम्भसामनन्तम्॥ ॥ 1-21-18(1306)

इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि एकविंशतितमोऽध्यायः॥ 21 ॥

Mahabharata - Adi Parva - Chapter Footnotes
1-21-3 क्षोभ्यमाणं मकरादिभिः॥ 1-21-7 पातालज्वलनो बडवाग्निः॥ 1-21-12 गां पृथ्वीं विन्दता लम्बमानेन॥ 1-21-15 डिम्बो भयवतामाक्रन्दस्तद्वति आहवे॥ 1-21-18 ते कद्रूविनते॥ एकविंशतितमोऽध्यायः॥ 21 ॥


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